क्या 99 फीसदी करेंसी नोटों की बैंकों में वापसी नोटबंदी की विफलता है?
September 5, 2018 • Rajeev Kumar Thakur

देश के अर्थजगत पर राजनीति करने वालों को क्या इतनी भी समझ नहीं है कि जब रिज़र्व बैंक द्वारा जारी की गई और चलन में रहे 99 फीसदी करेंसी नोट नोटबंदी के दौरान बैंकों में वापस आ गए तो कालेधन की समस्या रही ही कहां?

देश में नोटबंदी की सफलता और विफलता पर एक बार फिर से जोरदार बहस शुरू हो गई है. एक तरफ विपक्ष मोदी सरकार पर नोटबंदी को विफल करार देते हुए हमलावर है तो वहीँ सरकारी तंत्र नोटबंदी की सफलता और उसके फायदे गिनाते हुए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का राष्ट्रनिर्माण में सबसे अहम्  कदम बता रहे हैं. इस संबंध में गौरतलब है कि 30 अगस्त को भारतीय रिज़र्व बैंक ने अपनी सालाना रिपोर्ट में कहा था कि नोटबंदी के बाद बैंकों को 15.28 लाख करोड़ रुपये या 99 फीसदी बंद हुए नोट वापस मिल गए हैं. 99 फीसदी करेंसी नोटों की वापसी की खबर के साथ ही विपक्षी दलों को सरकार पर हमला बोलने का मौका मिल गया और सभी विपक्षी दलों ने एक सुर में नोटबंदी को सबसे बड़ा घोटाला यानि स्कैम बताना शुरू कर दिया है. हाँ, इसमें कोई दो राय नहीं होनी चाहिए कि नोटबंदी जैसे बड़े कदम से किसी भी देश की अर्थव्यवस्था पर तात्कालिक तौर पर बहुत ही बुरा असर होता है. भारत में भी हुआ है. सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) को नुकसान पहुंचा है, रोजगार पर असर पड़ा है, उद्योग और विनिर्माण जैसे क्षेत्रों में कुछ समय के लिए अफरा-तफरी मची रही. अगर इसपर विस्तृत चर्चा की जाए तो इसके जितने सकारात्मक पहलू निकल कर सामने आएंगे उतने ही सकारात्मक पहलू भी. बहरहाल, यहां सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि क्या 99 फीसदी करेंसी नोटों का बैंक में या सिस्टम में वापसी नोटबंदी की विफलता है? जवाब है नहीं. सही मायने में 99 फीसदी नोटों की वापसी को नोटबंदी की सबसे बड़ी सफलता मानी जानी चाहिए. इस संबंध में निम्न दो बिंदुओं पर गौर फरमाना बेहतर होगा.

कालेधन का सम्राज्य नेस्तनाबूद हो गया 

मोटे तौर पर माना गया है कि कालेधन को समाप्त करने के लिए अगर नोटबंदी जैसे कदम उठाए जाते हैं तो पकड़े जाने के डर से बड़ी संख्या में नगदी रखने वाले उसे नष्ट करने में ही अपनी भलाई समझते थे. परन्तु इस नोटबंदी में यह मिथ्या साबित हुआ. कालेधन के कुबेरों ने भी अपनी दौलत को बचाने के लिए बैंकों का रुख किया और जुर्माना देकर न केवल अपने ऊपर लगे कलंक को मिटाया बल्कि एक सभ्य और ईमानदार करदाता के रूप में अपनी पहचान भी बनाई. 99 फीसदी नोटों की वापसी से यह भी स्पष्ट हो गया कि जो नोट आतंकवादियों, देशद्रोहियों, काले कारनामे करने वालों और नक्सलियों के हाथों में थे वे सभी नकली थे और जो नोटबंदी के बाद अपने आप ही नष्ट भी हो गए. क्या ऐसे में कालेधन पर प्रहार के लिए मोदी सरकार का नोटबंदी का फैसला कारगर साबित नहीं हुआ? इसका जवाब उन आलोचकों को देना चाहिए जो 99 फीसदी नोटों की वापसी पर हायतौबा मचा रहे हैं.

करदाताओं की संख्या में रिकॉर्ड वृद्धि 

आंकड़े झूठ नहीं बोलते. नोटबंदी के बाद सरकार ने जो आंकड़े जारी किए हैं उससे स्पष्ट होता है कि पिछले दो वर्षों में प्रत्यक्ष कर संग्रह से सरकार की आमदनी बढ़ी है। 1 अप्रैल से 18 सितंबर के बीच प्रत्यक्ष कर संग्रह में 15.7 फीसदी की वृद्धि हुई है और यह 3.7 लाख करोड़ हो चुका है। इस संबंध में सरकार की मंशा भी स्पष्ट है. सरकार टैक्स बेस बढ़ाने के लिए प्रतिबद्ध है। नोटबंदी के दूसरे महत्वपूर्ण पक्ष की बात करें तो वर्तमान सरकार की दूरदृष्टि स्पष्ट होती है. इस संबंध में नरेन्द्र मोदी के आलोचकों को भी भ्रम नहीं होना चाहिए कि उनका अर्थशास्त्र दूरगामी परिणाम को परिलक्षित करता है. नोटबंदी द्वारा कालेधन पर प्रहार करने से अधिक सरकार का लक्ष्य अधिक से अधिक कामकाजी नागरिकों को देश की अर्थव्यवस्था की मुख्यधारा से यानि एक करदाता के रूप में शामिल करने की थी और सरकार अपने इस लक्ष्य को काफी हद तक भेदने में सफल भी रही. गौरतलब है कि पिछले दो वर्षों से करदाताओं की संख्या में भारी वृद्धि हुई है। वित्त वर्ष 2012-13 में 4.72 करोड़ लोगों ने टैक्स दिया, जबकि वित्त वर्ष 2016-17 में यह संख्या बढ़कर 6.26 करोड़ हो गई।

आंकड़ों से स्पष्ट है कि जैसे-जैसे देश में करदाताओं की संख्या बढ़ेगी वैसे-वैसे एक तरफ कालेधन पर लगाम लगेगा तो वहीँ दूसरी ओर सरकार के खजाने भरने से सरकार लोककल्याण के कार्यों के अलावा आधारभूत योजनाओं जैसे सड़क निर्माण, पूल निर्माण, बिजली की तंदुरुस्त व्यवस्था आदि पर भी भारी निवेश कर सकेगी. गौरतलब है कि किसी भी अर्थव्यवस्था के विकास में उच्च जीवन स्तर महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है. फिर देश में उच्च जीवन स्तर तभी लंभव है जब सरकार लोक कल्याण की योजनाओं पर अधिक से अधिक निवेश करे. ऐसे में देश में बढती करदाताओं की संख्या से अर्थव्यवस्था को काफी लाभ होगा.

अतः किसी को इस सत्य को  स्वीकार करने में कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए कि नोटबंदी के बाद बंद हुए पुराने नोटों की 99 फीसदी बैंकों में जमा होने से नोटबंदी का उद्देश्य कई मायनों में सफल हुआ है.