इजराइल में क्या होगा?
September 20, 2019 • राजीव कुमार ठाकुर

केवल छह महीने के अंदर दो बार चुनाव का सामना कर चुके इजराइल में राजनीतिक अनिश्चितता का दौर अभी भी जारी है. देश के वर्तमान प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की लिकुड पार्टी और उसकी सहयोगी दक्षिणपंथी पार्टियाँ 17 सितम्बर को हुए चुनाव और उसके बाद घोषित परिणाम में पूर्ण बहुमत पाने में असफल रही है. अब सवाल यह उठता है कि इजराइल की राजनीति में अगला घटनाक्रम क्या होगा?

इसी वर्ष अप्रैल में हुए चुनाव के बाद केवल एक सीट से सत्ता से दूर रहने वाले इजराइल के प्रधानमंत्री और लिकुड पार्टी के नेता बेंजामिन नेतन्याहू ने देश के जनमत के फैसले को अस्वीकारते हुए मध्यावधि चुनाव में जाने का फैसला किया. इसके बाद 17 सितम्बर को एक बार फिर से इजराइल में संसद का चुनाव कराया गया. इस चुनाव का परिणाम भी नेतन्याहू के लिए उम्मीदों के विपरीत रहा. पिछले चुनाव में केवल एक सीटों से पिछड़ने के कारण सरकार बनाने में असफल रहने वाली नेतन्याहू की लिकुड पार्टी और उसकी सहयोगी दक्षिणपंथी पार्टियों को इस चुनाव में बहुमत से और भी अधिक दूर यानि छह सीटों से पीछे रहना पड़ा है.

यहाँ उल्लेखनीय है कि इजराइल की संसद में 120 संसदीय सीट हैं. संसद में बहुमत के लिए किसी भी पार्टी के पास 61 सांसद होने चाहिए या फिर कम-से-कम इतने ही सांसदों का उनको समर्थन मिलना चाहिए. इस चुनाव के बाद आए परिणाम में लिकुड पार्टी को 31 सीटों पर सिमटना पड़ा जबकि मुख्य विपक्षी पार्टी ब्लू एंड वाइट को 33 सीटें और अरब पार्टी जॉइंट लिस्ट को 13 सीटें मिली हैं. अन्य के हिस्से में 41 सीटें आई हैं. इससे पहले अप्रैल में हुए आम चुनाव में लिकुड और ब्लू एंड वाइट पार्टी, दोनों को 35-35 सीटें मिली थीं.

सितम्बर में हुए मध्यावधि चुनाव इजराइल की राजनीति में एक बड़ा परिवर्तन भी लेकर आया है. इस बार इजराइल की राजनीति में यहूदी राष्ट्रवाद को एक बड़ी चुनौती मिली है. यह चुनौती अरब पार्टियों की ओर से मिली है. दक्षिणपंथी और उदारवादी पार्टियों के सत्ता संघर्ष के बीच अरबों ने इजराइल की राजनीति में मजबूत घुसपैठ कर ली है. इस बार अरब पार्टियों ने जॉइंट लिस्ट के बैनर तले गठबंधन बनाकर चुनाव लड़ा और उनके उम्मीदवार 13 सीटों पर विजय रहे. यहाँ उल्लेखनीय है कि इजराइल में अरब वोटरों की संख्या 18 लाख है जो कुल वोटरों का करीब 20 फीसदी है. ये वोटर अभी तक चुनावों में उदासीनता दिखाते रहे हैं जिसके कारण अरब उम्मीदवार चुनाव जीतने में नाकामयाब होते रहे हैं.

अरबों की चुनाव में नाकामयाबी की दूसरी वजह उनके वोटों का बंटवारा भी रहा है. इजराइल में तीन अरब पार्टियाँ हैं जो स्वतंत्र तौर पर चुनाव में हिस्सेदारी करती रही है. परन्तु इस चुनाव में तीनों ने गठबंधन बनाकर चुनाव लड़ा और अरब मतदाताओं ने भी उत्साह दिखाते हुए 60 फीसदी मतदान किया. परिणामस्वरूप अरब पार्टियाँ देश की मुख्यधारा की पार्टियों को कड़ी चुनौती पेश करने में सफल हुई.

इजराइल में नेतन्याहू की पराजय के पीछे उनके ही एक पूर्व सहयोगी अविगदोर लिबरमन का बहुत बड़ा हाथ है. कभी इजराइल की राजनीति में नेतन्याहू के सबसे अधिक विश्वासपात्र माने जानेवाले लिबरमन अभी उनके मुखर विरोधियों में माने जाते हैं. धुर दक्षिणपंथी विचारधारा के अविगदोर लिबरमन अक्सर अपने अरब विरोधी बयानों की वजह से विवादों में भी घिरे रहे हैं और उनकी गिनती इजराइल के बेहद विवादास्पद नेताओं में होती है. कहा जाता है कि लिबरमन की कड़ी मेहनत की वजह से ही बेंजामिन नेतन्याहू प्रधानमंत्री के पड़ पर काबिज़ हो सके थे. यही कारण था कि नेतन्याहू के पहले कार्यकाल के दौरान लिबरमन को डायरेक्टर जनरल का पड़ मिला था और वह सरकार में सबसे प्रभावशाली लोगों में गिने जाते थे.

परन्तु वर्ष 1996 में नेतन्याहू के पहली बार इजराइल के प्रधानमंत्री बनने के बाद सिर्फ 18 महीने में ही दोनों के बीच व्यक्तिगत मतभेद उभरकर सामने आने लगे और जल्दी ही 20 वर्षों के अटूट संबंध का अंत हो गया. इसके बाद लिबरमन ने राजनीति को छोड़कर व्यापार का रुख किया और ढेर सारा धन कमाया. बाद के वर्षों में उनपर गैरकानूनी तरीके से धन अर्जित करने का आरोप भी लगा. परन्तु इस सबसे बेखबर लिबरमन एक बार फिर से राजनीति के मंच पर उतरे और इजराइल बेतेनु नाम से राजनीतिक पार्टी बनाकर एक नई पारी की शुरुआत की.

इस वर्ष अप्रैल में हुए आम चुनाव के बाद लिबरमन ने नेतन्याहू को समर्थन देने से इंकार कर दिया था जिसकी वजह से केवल एक सीट की कमी से नेतन्याहू सरकार बनाने में असफल हो गए थे. फिर जब 17 सितम्बर को चुनाव कराया गया तो भी किसी पार्टी को सरकार गठित करने के लिए बहुमत नहीं मिला. लिबरमन की इजराइल बेतेनु पार्टी को 8 सीटें मिली हैं और यही वह सीटें हैं जो सरकार बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं. परन्तु इस बार की संभावना कम ही है कि लिबरमन नेतन्याहू को समर्थन देंगे.

अब सवाल यह उठता है कि इजराइल में सरकार बनाने के लिए किस तरह के राजनीतिक समीकरण बनने की संभावना है. पहली संभावना नेतन्याहू द्वारा सरकार गठन की है जिसमें लिबरमन का शामिल होना जरूरी है. परन्तु लिबरमन का जो रवैया है उससे इसकी संभावना कम ही लगती है. इसके अलावा कोई ऐसी पार्टी नहीं है जो नेतन्याहू को समर्थन देने के पक्ष में हैं. हालाँकि अपनी कमजोर स्थिति को भांपते हुए नेतन्याहू ने ब्लू एंड वाइट पार्टी के अध्यक्ष बेनी गैंट से अपील की है कि देश में यूनिटी गवर्नमेंट का गठन किया जाए. परन्तु इसकी संभावना भी कम ही दिख रही है क्योंकि बेनी गैंट और नेतन्याहू की विचारधारा में जमीन-आसमान का अंतर है. गैंट उदारवादी विचारधारा के हैं और नेतन्याहू घोर दक्षिणपंथी विचारधारा के समर्थक हैं. गैंट की विचारधारा फिलिस्तीन समस्या को लेकर उदारवादी रहा है और वह इसके लिए बातचीत करने दस पक्षधर रहे हैं परन्तु नेतन्याहू फिलिस्तीन समर्थकों पर दबाव बनाते रहे हैं और आज भी इसके प्रति आक्रामक हैं.

सरकार गठन की तीसरी संभावना पर सबकी नज़रें गैंट की ब्लू एंड वाइट पार्टी और जॉइंट लिस्ट पर जाकर टिक जाती हैं और इसके पक्ष में संभावनाएं भी हैं. जॉइंट लिस्ट को लेकर इजराइल की राजनीति   में दो तरह की संभावनाएं बनती दिख रही हैं. पहली संभावना है कि अरब समर्थक जॉइंट लिस्ट गैंट की ब्लू एंड वाइट पार्टी को बाहर से समर्थन देकर सरकार के गठन में भूमिका निभाए. यह कोई अजूबा नहीं होगा. इससे पहले भी इजराइल में ऐसा हो चुका है जब वर्ष 1992 में अरब पार्टियों ने येत्जिक रोबिन की सरकार को बाहर से समर्थन दिया था.

दूसरी संभावना यूनिटी गवर्नमेंट की है, अगर संभव होता है तो. ऐसे में नेतन्याहू की लिकुड पार्टी और गैंट की ब्लू एंड वाइट पार्टी की मिलीजुली सरकार होगी और संसद में मुख्य विपक्ष की भूमिका में अरब पार्टियों का समूह जॉइंट लिस्ट होगी. अगर ऐसा होता है तो यह इजराइल के इतिहास में एक अभूतपूर्व घटना होगी.