क्या भारत में छद्म धर्मनिरपेक्षता के दिन लदते जा रहे हैं?
July 31, 2019 • राजीव कुमार ठाकुर

इस वर्ष संसद के मॉनसून सत्र में जैसा माहौल देखने को मिल रहा है वह न सिर्फ अजूबा है बल्कि इतिहास के पन्नों में भी दर्ज होनेवाला है. यह सब इसलिए नहीं कि केंद्र सरकार थोक की मात्रा में बिल पास कराते जा रही है बल्कि इसलिए कि विपक्ष दिशाहीनता की परकाष्ठता को छूने को बेताब है. इस सत्र में केंद्र सरकार ने तीन तलाक और एनआईए से संबंधित कई ऐसे बिल और संशोधन दोनों सदनों से पास करा लिए हैं जो विवादास्पद तो रहे ही हैं, कई दलों की नजरों में इनसे देश की धर्मनिरपेक्षता को भी खतरा पैदा हो रहा था! तो क्या अब यह समझना चाहिए कि संप्रदायिकता का राग अलापने वाले दल व नेता देश की राजनीति के हाशिए पर पहुँच चुके हैं?

देश की संसद के उच्च सदन में 30 जुलाई को जो कुछ हुआ वह कई मायने में न केवल अजूबा रहा बल्कि ऐतिहासिक भी रहा. केंद्र सरकार और उसकी संसदीय व्यवस्था को संभालने वाले फ्लोर मैनेजरों ने अपनी जिस चतुराई और प्रबंधन की मिसाल पेश की उसकी दाद सभी को देनी होगी. सत्ताधारी पार्टी की इसी चतुराई और अभूतपूर्व प्रबंधन का नतीजा रहा कि विपक्ष बिखर गया और सरकार ने पासा पलटते हुए प्रतिष्ठा का विषय बने तीन तलाक बिल को राज्यसभा से पास करा लिया. यह एक ऐसा बिल रहा है जिसके वर्तमान प्रारूप पर सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी को छोड़कर किसी भी दल की पूर्ण सहमति कभी नहीं रही. इससे पहले सूचना का अधिकार (संशोधन) विधेयक को भी भारी विरोध के बावजूद नरेंद्र मोदी सरकार पास कराने में सफल रही. इसी प्रकार गैरकानूनी गतिविधियाँ (रोकथाम) कानून के तहत राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) को ज्यादा अधिकार देने संबंधी संशोधन को लोकसभा से पास कराने के बाद