खाड़ी संकट : कुछ भी हो सकता है!
June 19, 2019 • राजीव कुमार ठाकुर

अमेरिका और ईरान के बीच आरोपों-प्रत्यारोपों का दौर खतरनाक स्तर तक पहुँचता जा रहा है. दोनों एक-दूसरे को युद्ध तक की धमकी दे रहे हैं. इस मसले पर विश्व समुदाय तो अभी लगभग निष्पक्ष है और कई प्रभावशाली देश दोनों पक्षों को संयम बरतने की सलाह दे रहे हैं. परन्तु दोनों देशों के तेवर से ऐसा प्रतीत हो रहा है कि न चाहते हुए भी कहीं दोनों देश युद्ध की चपेट में न आ जाएँ.

अमेरिका और खाड़ी देश ईरान के बीच की दुश्मनी की खाई दिनों-दिन और अधिक चौरी होती जा रही है. इस दुश्मनी की आग में घी का तड़का तब लगा जब इस महीने ओमान की खाड़ी में दो तेल टैंकर वाले पोतों पर हमला हुआ. इस हमले के बाद अमेरिका आगबबूला हो गया और उसने ईरान को इसके लिए जिम्मेदार ठहराया है. अमेरिका ने आरोपों के साथ सबूत के तौर पर एक विडियो भी जारी किया है जिसमें शिकार हुए तेल पोतों के पास एक छोटा ईरानी जहाज नज़र आ रहा और यह भी दिख रहा है कि कुछ लोग तेल पोतों में से विस्फोटक निकालकर ईरानी जहाज में डाल रहे हैं. हालाँकि इस विडियो में स्पष्टता का अभाव है. बहरहाल अभी और भी जांच जारी है और आगे यह देखना और भी दिलचस्प होगा कि अबूझ पहेली बने इस हमले की जिम्मेवारी किस पर तय होती है.

ऐसा भी नहीं है कि खाड़ी से गुजरने वाले व्यापारिक जहाजों और तेल टैंकर पर यह पहला हमला है. पिछले महीने यानि मई में भी संयुक्त अरब अमीरात के पास व्यापारिक जहाजों पर चार हमले हुए थे. उस समय भी अमेरिका ने इस हमले के लिए ईरान को जिम्मेदार ठहराया था और तभी से दोनों देशों के बीच तनाव अपने चरम पर पहुँचने लगा था. अब ओमान की खाड़ी में हुए हमले से माहौल में और अधिक गर्मी आ गई है.

अब सवाल यह उठता है कि क्या अमेरिका ईरान पर हमला करेगा? परिस्थिति वाकई में गंभीर होती जा रही है. दोनों पक्षों में जुबानी जंग भी अपने चरम पर है. अमेरिका की घातक मंशा को उसके विदेश मंत्री माइक पोम्पियो के बयान से आसानी से समझा जा सकता है जिसमें वह कहते हैं, 'जो सबूत हमने पेश किए हैं और हमारे निष्कर्षों का जो आधार है वह खुफिया जानकारी, हमले में इस्तेमाल किए गए हथियार, विशेषज्ञों की राय और हाल के वर्षों में ईरान द्वारा किए गए हमले के तौर-तरीके हैं. फिर इस प्रकार के हमले के लिए जो संसाधन और तकनीक ईरान के पास है वह इस क्षेत्र में सक्रिय अन्य किसी के पास नहीं है.'

माइक पोम्पियो के बयान से स्पष्ट है कि अमेरिका ईरान के प्रति क्या इरादा रख रहा है. हालाँकि इस मुद्दे पर अभी तक न ही नाटो के देश और न ही अमेरिकी सामरिक गुट का कोई पश्चिमी देश अमेरिका के पक्ष में सामने आया है. इसके विपरीत जापान जैसे देश जो अमेरिका के मित्र देश हैं माहौल को सामान्य बनाने के लिए कूटनीतिक स्तर पर प्रयास कर रहे हैं. जापान के प्रधानमंत्री शिंजो अबे की हाल में हुई ईरान की यात्रा इसी कूटनीतिक प्रयास का एक हिस्सा माना जा रहा है.

दूसरी तरफ ईरान अमेरिकी आरोपों को सिरे से खारिज कर रहा है. इस सम्बन्ध में ईरान का कहना है कि कोई ताकत है जो इस तरह के करतूतों को अंजाम देकर ईरान का विश्व बिरादरी से सम्बन्ध खराब करना चाहता है. ईरान का स्पष्ट इशारा अमेरिका की ओर है.

वैसे भी कूटनीतिक और सामरिक विशेषज्ञों की मानें तो अमेरिकी आरोप की निष्पक्षता भी संदेह से परे नहीं है. अमेरिका ने यह आरोप तो लगा दिया कि तेल टैंकर पर ईरान ने हमला करवाया है परन्तु यह बताने में वह अभी तक नाकाम रहा कि तेल टैंकर के पोतों तक विस्फोटक पहुंचा तो कैसे पहुंचा? वैसे भी माना जाता है कि खाड़ी के देशों में अमेरिका का खुफिया तंत्र बहुत ही मजबूत स्थिति में है. केवल अमेरिकी खुफिया एजेंसी ही क्यों, उसके मित्र इजराइल की खुफिया एजेंसी को तो अरब और खाड़ी के देशों की खुफियागिरी में महारत हासिल है. फिर वे कैसे यह पता लगाने में नाकाम रहे कि तेल टैंकर के पोतों में विस्फोटक कैसे पहुँचाया गया?

बहरहाल, ईरान के प्रति अमेरिकी तेवर जैसे भी हों परन्तु ट्रम्प प्रशासन के अबतक के रुख से ऐसा मान लेना जल्दबाजी होगा कि अमेरिका ईरान पर हमला करेगा. उत्तर कोरिया के प्रति ट्रम्प की नीति किसी से छिपी नहीं है. युद्ध की धमकी देते-देते दोनों देश आख़िरकार कैसे बातचीत की टेबल पर आ बैठे थे. चीन के साथ भी अमेरिका शह-मात के खेल में लगा हुआ है. ऐसे में यह विश्वास कर लेना असंभव है कि अमेरिका जल्दबाजी में ईरान के विरुद्ध सैन्य कार्यवाही जैसा जोखिम उठाना चाहेगा. हाँ, विपरीत परिस्थिवश ऐसा कोई संयोग बनता है तो दोनों देशों के बीच सैन्य टकराहट से भी इंकार नहीं किया जा सकता.

हालाँकि वर्तमान परिस्थिति में कोई देश नहीं चाहेगा कि खाड़ी और मध्य-पूर्व में संकट बढ़े. ब्रिटेन ने तो अमेरिका की हाँ में हाँ मिलाने की बजाय परिस्थिति पर खुद का आकलन करने की बात कही है. इसके अलावा इस मुद्दे पर खाड़ी के अन्य देश क्या रुख अपनाते हैं इसपर भी सबकी नजरें टिकी रहेंगी. संभवतः इस बीच अमेरिका की कोशिश रहेगी कि वह ईरान पर प्रतिबंधों की झड़ी लगा दे और विश्व बिरादरी से ईरान का संपर्क पूरी तरह से काट दे.

एक दृष्टिकोण से माना यह भी जा रहा है कि तेल टैंकर पर हमले ईरान की कट्टरपंथी और राष्ट्रवादी समूह की बदले की कार्यवाही हो सकती है. इस समूह में सबसे आगे नाम आता है रिवॉल्यूशनरी गार्ड कॉर्प का, जो ख़ुद को स्वायत्त नौसेना बल कहते हैं. अमेरिकी दादागिरी और धमकियों को कुंद करने के लिए हो सकता है कि इस संगठन ने इस तरह के कदम उठाए हों.

यह तो स्पष्ट है कि खाड़ी में स्थिति चिंताजनक बनी हुई है परन्तु युद्ध जैसी स्थिति अभी फौरी तौर पर नहीं कही जा सकती है. दोनों में से कोई भी देश युद्ध की नौबत नहीं आने देना चाहेंगे. अमेरिका के पास शक्तिशाली सेना तो है, लेकिन हवा और समुद्र में ईरान से लड़ना उनके लिए ख़तरनाक साबित हो सकता है. इसके अलावा ईरान अपने ऊपर संकट बढ़ता देख तेल का खेल भी खेल सकता है. तो क्या यह माना जा सकता है कि समुद्र में व्यापारिक जहाजों पर हमला करवाकर ईरान अमेरिका को उकसा रहा है? हो सकता है ईरान एक तरफ अमेरिका के धैर्य की परीक्षा ले रहा हो तो दूसरी तरफ वह यह आंकने की कोशिश भी कर रहा हो कि ऐसी परिस्थिति और कृत्य से विश्व बिरादरी की क्या प्रतिक्रिया होती है. इस आकलन के बाद वह संभवतः कोई कड़ा कदम उठाने पर विचार करे.

बहरहाल, खाड़ी संकट पर पूरी दुनिया की नज़र टिकी हुई है. वहां कब क्या हो जाए फिलहाल कहा नहीं जा सकता.