चंद्रबाबू दा जबाव नहीं!
August 23, 2018 • Rajeev Kumar Thakur

संभवतः हम सभी को याद होगा जब एकीकृत आंध्र प्रदेश का मुख्यमंत्री रहते हुए चंद्रबाबू नायडू अपने आपको मुख्यमंत्री । कम प्रदेश का मुख्य कार्यकारी अधिकारी यानि सीईओ कहलाना ज्यादा पसंद करते थे। इससे स्पष्ट है कि वह शासन और सत्ता को चलाने में एक राजनेता से अधिक कॉरपोरेट स्टाईल को महत्व देते थे। हालांकि एक बेहतर शासक होने के बावजूद चन्द्रबाबू नायडू अपने पहले कार्यकाल में विशेष छाप नहीं छोड़ सके। इसकी वजह शायद उनका काम करने का वह तरीका रहा हो जिसके तहत उन्होंने सस्ती लोकप्रियता के मुकाबले विकास को ज्यादा महत्व दिया। समय बदला और राजनीतिक कारणों से आंध्र प्रदेश का बंटवारा हुआ। आंध्र प्रदेश के भौगोलिक नकशे पर आंध्र और तेलंगाना नामक दो राज्यों का उदय हुआ। आंध्र की पुरानी राजधानी हैदराबाद को तेलंगाना की राजधानी होने का गौरव प्राप्त हुआ और आंध्र प्रदेश के लिए राजधानी की तलाश शुरू हुई। ।

संयोग ही कहा जाएगा कि नए आंध्र प्रदेश केगठन के बाद हुए पहले चुनाव में चन्द्रबाबू नायडू के नेतृत्व वाली तेलगूदेशम पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में आई और चन्द्रबाबू एक बार फिर से आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री बने। मुख्यमंत्री बनते ही नायडू ने प्रदेश के तीव्र विकास के लिए सीईओ की तरह काम करना शुरू कर दिया। उनके सामने चुनौतियां कम नहीं थी। पहला तो उन्हें राज्य के लिए राजधानी की तलाश करनी थी और दूसरा राज्य में तीव्र औद्योगिक विकास का रोडमैप तैयार करना।।

केवल 15 महीनों में चन्द्रबाबू ने चुपके से वह सबकुछ कर लिया जिसका सपना अभी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पूरे देश के लिए देख रहे हैं। यानि स्मार्ट सिटी का निर्माण। चंद्रबाबू नायडू ने अपनी राजधानी के लिए 15 महीनों में 30 हजार एकड़ जमीन जुटाई। यही नहीं 15 महीनों में उन्होंने सिंगापुर जैसे शहर का खाका बना कर अमरावती बसाने की भूमि पूजा करवा दी। यहां गौर करने वाली बात है कि जब भूमि अधिग्रहण के मुद्दे पर पूरा देश उबल रहा था उस समय नायडू अमरावती के लिए जमीन जुटाने में मग्न थे। आखिर नायडू के जमीन अधिग्रहण में ऐसी क्या बात थी जिसका राज्य में विशेष विरोध भी नहीं हुआ। स्पष्ट है, नायडू की राजनीतिक और प्रशासनिक कौशलता का यह एक ऐसा उदाहरण है जिसका अनुकरण केन्द्र और सभी राज्य सरकारों को करना चाहिए।

अमरावती के लिए सभी परियोजनाओं के साथ सबसे अच्छी बात यह रही कि भूमि अधिग्रहण में कोई समस्या नहीं हुई। खबर के मुताबिक इसके लिए कुल 54,000 एकड़ जमीन ली गई है। इसमें सरकार की जमीन 21,000 एकड़ है और बाकी जमीन 29 गांवों के 23 हजार किसानों की है। प्रदेश सरकार ने जमीन हासिल करने के लिए अद्भुत तरीका अपनाया। सरकार ने 31,000 एकड़ जमीन 18 हजार किसानों से खरीदी है। इसके एवज में किसानों को 50,000 रुपए प्रति एकड़ की कीमत हर साल 10 सालों तक मिलेगी। इसके साथ ही 1,250 वर्ग गज जमीन घर के लिए मिलेगी और 200 वर्ग गज व्यवसाय के लिए। जिसने भी जमीन दी है उन सभी को सरकार यह सुविधा देगी। सरकार को जमीन पर कुल 7500 करोड़ रुपए खर्च करने पड़ेंगे लेकिन वह भी किस्तों में, जिन्हें सरकार द्वारा किसानों को कई साल में चुकाने होंगे। चन्द्रबाबू नायडू ने अंजाम दिया है।