मुसीबत के इस दौर में परमाणु तकनीक बेचने की जुर्रत कर सकता है पाकिस्तान!
June 22, 2019 • राजीव कुमार ठाकुर

पाकिस्तान आर्थिक तबाही के दौर से गुजर रहा है. देश में महंगाई जनता की कमर तोड़ने की ओर अग्रसर है. विभिन्न देशों और संस्थाओं से लिए गए कर्ज़ में पाकिस्तान सर तक डूबा हुआ है. उसके भविष्य के आगे अँधेरा ही अँधेरा है. ऐसी स्थिति में अंतिम उपाय के तौर पर क्या पाकिस्तान अपने पास उपलब्ध परमाणु तकनीक को बेचकर भारी-भरकम धन प्राप्त करने का प्रयास कर सकता है? पाकिस्तान की इस संभावित हरकत पर किसी को संदेह नहीं होना चाहिए क्योंकि पाकिस्तान पहले भी उत्तर कोरिया और लीबिया जैसे अतिमहत्वाकांक्षी राष्ट्र को परमाणु तकनीक बेचने का कृत्य कर चुका है.

आर्थिक बर्बादी के दौर में पहुँच चुका पाकिस्तान चारों तरफ हाथ-पांव मारने के बाद अब जिल्लत और बेबसी के भरोसे है. देश में दूध और पेट्रोल के दाम आसमान छू रहे हैं. आकंठ तक कर्ज़ में डूबे पाकिस्तान की हालत यह है कि उसे अपने कुल राजस्व का आधा कर्ज़ के ब्याज के तौर पर चुकाना पड़ रहा है. उसे और अधिक कर्ज़ और आर्थिक सहायता मिलने में मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है क्योंकि आतंकवादी संगठनों को वित्तीय सहायता पहुँचाने के आरोप में पाकिस्तान अंतर्राष्ट्रीय फाइनेंसियल एक्शन टास्क फ़ोर्स की निगरानी सूची यानि ग्रे लिस्ट में शामिल है. आतंकवाद रोकने में सहयोग के नाम पर एक लंबे अर्से से अमेरिका से मिलने वाला भारी-भरकम धन भी अब बंद हो चुका है. चीन से वह पहले ही इतना कर्ज़ ले चुका है कि उसे वापस करना तो दूर उसका ब्याज भी वह नहीं चुका पा रहा है.

ऐसे में अब पाकिस्तान के पास दिवालिया होने से बचने के लिए एक ही रास्ता बचता है और वह रास्ता है परमाणु तकनीक का सौदा. पाकिस्तान के इतिहास को अगर देखा जाए तो उसके लिए इस तरह का कृत्य कोई नई बात नहीं है. पहले भी पाकिस्तान ने चोरी-छिपे उत्तर कोरिया, ईरान और लीबिया को परमाणु तकनीक बेचे हैं और इस सौदे में उनके परमाणु वैज्ञानिक डॉ. अब्दुल कदीर खान का विशेष योगदान रहा है.

डॉ. अब्दुल कदीर खान की गिनती बदनाम परमाणु वैज्ञानिक के तौर पर होती रही है. पाकिस्तान को परमाणु ताक़त बनाने का उनका रिकॉर्ड भी विवादास्पद ही रहा है. विदेशी परमाणु लेबोरेटरी में नौकरी कर उन्होंने परमाणु संवर्धन और उपकरणों की जानकारी जुटाई थी और उसी जानकारी और तकनीक के आधार पर डॉ. खान ने पाकिस्तान में परमाणु हथियार को विकसित करने की नीब रखी थी.

पाठकों की जानकारी के लिए यहाँ संक्षेप में डॉ. अब्दुल कदीर खान की कारगुजारियों का उल्लेख करना अति आवश्यक है. वर्ष 1935 में अविभाजित भारत के भोपाल में जन्मे अब्दुल कदीर खान भारत की आज़ादी के बाद परिवार सहित पाकिस्तान में बस गए थे. वर्ष 1960 में पाकिस्तान के करांची विश्वविद्यालय से धातु विज्ञान की पढाई करने के बाद उन्होंने परमाणु इंजीनियरिंग से सम्बंधित पढाई करने के लिए पश्चिमी जर्मनी, बेल्जियम और नीदरलैंड्स का रुख किया. परमाणु इंजीनियरिंग की पढाई पूरी करने के बाद वर्ष 1972 में उन्हें नीदरलैंड स्थित फिजिकल डायनामिक्स रिसर्च लेबोरेटरी में नौकरी शुरू की. उस दौर में परमाणु उपकरणों के निर्माण के लिए मशहूर बहुराष्ट्रीय कंपनी 'युरेन्को' के साथ नीदरलैंड की इस कंपनी की सहभागिता थी. ब्रितानी, जर्मनी और डच मूल की कंपनियों का यह समूह परमाणु उर्जा के उत्पादन करने के लिए यूरेनियम संवर्धन यानि एनरिच्मेंट के शोध और विकास के लिए काम करता था. यहाँ जिस तकनीक का इस्तेमाल किया जाता था उसे 'जिप्पी सेंट्रीफ्यूज' कहते हैं. इस तकनीक में मामूली परिवर्तन कर एटम बम बनाने के लिए अहम् कच्चा माल भी बनाया जा सकता था. फिर क्या था. शातिर दिमाग के डॉ. अब्दुल कदीर खान ने मौके का फायदा उठाते हुए यहाँ से परमाणु बम बनाने सम्बन्धी तकनीकी जानकारियों को इकठ्ठा करना शुरू कर दिया.

परमाणु बम बनाने सम्बन्धी खुफिया जानकारियों पर आधारित जो दस्तावेज अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर उपलब्ध हैं उसका उल्लेख ब्रिटानिका एन्स्यक्लोपेडिया में है, जिसके अनुसार, 'खान ने एक लो-लेवल सुरक्षा मंजूरी प्राप्त की और इस तकनीक को सीख लिया कि 'जिप्पी सेंट्रीफ्यूज' कैसे बनाया जा सकता है. इतना ही नहीं उन्होंने 'युरेन्को' के सप्लाई चेन का इस्तेमाल करके इसके लिए जरूरी पुर्जों और उपकरणों को इकठ्ठा करने का तरीका भी खोज लिया था.'

वर्ष 1974 में जब भारत ने अपना पहला परमाणु परीक्षण किया था उस समय डॉ. खान फिजिकल डायनामिक्स रिसर्च लेबोरेटरी में ही काम कर रहे थे. भारत द्वारा परमाणु परीक्षण की खबर सुनते ही डॉ. खान के शातिर दिमाग में न केवल पाकिस्तानी राष्ट्रवाद का उफान उठा बल्कि आगे उन्हें एक सुनहरे भविष्य भी नज़र आने लगे. मौके का फायदा उठाते हुए डॉ. अब्दुल कदीर खान ने पाकिस्तानी खुफिया विभाग के साथ काम करना शुरू कर दिया.

जल्द ही डॉ. अब्दुल कदीर खान की नापाक गतिविधियों की भनक सीआईए और पश्चिमी खुफिया एजेंसियों को लग गई और पकड़े जाने के डर से अचानक एक दिन दिसम्बर 1975 में वे परिवार सहित नीदरलैंड से पाकिस्तान भाग गए. पाकिस्तान में डॉ. खान ने पाकिस्तानी सरकार के साथ मिलकर परमाणु बम बनाने का कार्यक्रम शुरू किया. यहाँ पर उन्हें यूरोप से चोरी किए गए दस्तावेज और ज्ञान काफी काम आए और दुनिया को धोखा देते हुए पाकिस्तान ने डॉ. अब्दुल कदीर खान के नेतृत्व में 28 मई 1998 को सार्वजनिक तौर पर पहला परमाणु परीक्षण किया.

पाकिस्तान को परमाणु संपन्न राष्ट्र बनाने के बाद डॉ. अब्दुल कदीर खान ने 'जिप्पी सेंट्रीफ्यूज' के डिजाईन और उपकरणों की बिक्री के लिए दुनिया के अलग-अलग भागों में कई कंपनियां बनाई. उनका यह व्यापार जल्दी ही फलने-फूलने लगा. उनके खरीदारों में ईरान भी शामिल था जिसने पाकिस्तानी परमाणु मॉडल से प्रेरित होकर युरेनियम संवर्धन करने के लिए परमाणु केंद्र का निर्माण किया था. इसी क्रम में खुफिया रिपोर्टों को माने तो डॉ. खान ने लगभग 13 बार उत्तर कोरिया का दौरा किया था और उसे परमाणु तकनीक बेची थी. डॉ. खान ने लीबिया को भी परमाणु तकनीक बेची थी.

डॉ. खान की गतिविधियों का खुलासा होने पर अमेरिका ने उनकी कंपनियों पर न केवल प्रतिबन्ध लगा दिया बल्कि पाकिस्तान को मजबूरन उन्हें गिरफ्तार भी करना पड़ा. गिरफ़्तारी के बाद उन्होंने बेशर्मी की हद को पार करते हुए परमाणु तकनीक के अंतर्राष्ट्रीय तस्करी को न केवल स्वीकारा बल्कि पाकिस्तान सरकार का बचाव करते हुए इसकी पूरी जिम्मेदारी अपने ऊपर ले ली.

भले ही डॉ. अब्दुल कदीर खान ने दूसरे देश को चोरी-छिपे परमाणु तकनीक बेचने की जिम्मेदारी अपने सर ली हो परन्तु इसपर विश्वास करना मुश्किल है कि इसमें पाकिस्तानी सरकार, उसकी सेना और उसकी खुफिया एजेंसी की महत्वपूर्ण भूमिका न रही हो. वैसे भी पाकिस्तान की सरकार पर दुनिया के किसी भी देश को भरोसा नहीं है. पाकिस्तान भले ही राग अलापता रहा हो कि उसका परमाणु कार्यक्रम एकदम सुरक्षित है लेकिन इसपर शायद ही कोई भरोसा करे.

अब जब पाकिस्तान की आर्थिक हालत एकदम खस्ता है और कोई भी उसकी सहायता को आगे नहीं आ रहा है, केवल सऊदी अरब को छोड़कर, तो इस संकेत का अर्थ सबको समझ में आ जाना चाहिए. सऊदी अरब खुलेआम कह चुका है कि अगर ईरान परमाणु बम बनाता है तो वह भी परमाणु बम बनाएगा. संकेत स्पष्ट है कि वह परमाणु बम बनाने के लिए परमाणु तकनीक कहाँ से लाएगा. हाल ही में सऊदी अरब द्वारा पाकिस्तान को भारी-भरकम आर्थिक सहायता देने का उद्देश्य क्या हो सकता है? फिर दुश्मन का दुश्मन तो दोस्त भी होता है. ईरान का सम्बन्ध सऊदी अरब और पाकिस्तान से किसी से छिपा नहीं है. तो क्या यह मान लिया जाए कि पाकिस्तान ने सऊदी अरब से मिले धन के बदले परमाणु तकनीक का सौदा कर लिया है?

इस बात में दम होने के कई कारण हो सकते हैं. वर्तमान में खाड़ी में जो तनाव का दौर शुरू हुआ है और ईरान ने आक्रामक रूप अपनाया हुआ है उससे सऊदी अरब पर विशेष खतरा मंडराने लगा है. अमेरिकी धमकी के आगे ईरान झुकने को तैयार नहीं है. अगर खाड़ी में तनाव बना रहता है तो ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम में तेजी ला सकता है और दूसरी तरफ सऊदी अरब को भी मजबूरन अपने परमाणु कार्यक्रम की शुरुआत करनी पड़ सकती है.

इसमें कोई शक नहीं कि खाड़ी संकट से पाकिस्तान की बांछे खिली हुई हैं और वह जल्दी ही मौके का फायदा उठाकर ढेर सारा धन प्राप्त करने की जुगत में लगा हुआ है.