राफेल पर क्या कांग्रेस अकेले सवारी करेगी?
September 9, 2018 • Rajeev Kumar Thakur

2019 लोकसभा चुनाव के परिप्रेक्ष्य में कांग्रेस एक तरफ जहाँ राफेल सौदे को लेकर मोदी सरकार पर हमलावर है वहीँ अन्य विपक्षी दल इस मुद्दे पर मौन हैं.

2019 के लोकसभा चुनाव से पूर्व एक तरफ जहाँ कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल गाहे-बगाहे एकता और महागठबंधन की बात करते हैं लेकिन वहीँ दूसरी ओर हालात ऐसे हैं कि कांग्रेस सहित किसी भी दल में मोदी सरकार को घेरने के लिए मुद्दों पर सहमती बनती नहीं दिख रही है. कांग्रेस फ्रांस के साथ हुए राफेल लड़ाकू विमान सौदे में भ्रष्टाचार को मुद्दा बनाते हुए मोदी सरकार पर हमलावर तो है परन्तु अन्य विपक्षी दलों का इस मुद्दे पर रुख अभी तक ठंढ़ा है. ममता बनर्जी, मायावती, अखिलेश यादव, चंद्रबाबू नायडू, तमिलनाडु की डीएमके के स्टालिन जैसे क्षेत्रीय क्षत्रप अपने ही राज्य में अपना वजूद बचाने में उलझे हुए हैं तो वहीँ वामपंथी पार्टियाँ मोदी सरकार के चक्रव्यूह से अपने आपको निकालने के लिए जद्दोजहद कर रही है. ऐसा नहीं है कि मोदी सरकार को घेरने के लिए विपक्षी दलों के पास मुद्दों का अभाव रहा है. परन्तु मोदी सरकार ने ऐन-केन प्रकारेन सभी मुद्दों को कुंद कर दिया है या फिर उसके दायरे को ही सीमित कर दिया है.

उदाहरण के तौर पर एससी/एसटी एक्ट पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले और उसपर मचे बबाल को ही लेते हैं. अन्य दलों के साथ कांग्रेस भी इस मुद्दे को भुनाने में लग गई थी परन्तु मोदी सरकार ने संसद द्वारा उस एक्ट को पुनः बहाल कर कांग्रेस सहित विपक्ष की चुनावी धार को कुंद कर दिया. मॉब लिंचिंग भी एक ऐसा मुद्दा रहा है जिसपर मोदी सरकार को कांग्रेस सहित अन्य विपक्षी दल घेरने से नहीं चुके हैं. परन्तु जो हालात दिख रहे हैं उससे स्पष्ट है कि यह मुद्दा भी चुनावी मोर्चे पर पस्त है. नोटबंदी और जीएसटी जैसे मुद्दों पर भी कांग्रेस अकेले पड़ती दिख रही है. दूसरे विपक्षी दल को संभवतः समझ में आ चुका है कि इस मुद्दे पर वह मोदी सरकार को बैकफुट पर लाने में नाकाम है. असम में नागरिक रजिस्टर के मुद्दे पर कांग्रेस असमंजस में है. इस मुद्दे पर कांग्रेस ने ममता बनर्जी को आगे बढ़ाया परन्तु वह भी कुछ दिनों तक हो-हल्ला मचाने के बाद चुप बैठ गई हैं. ऐसे में सभी मुद्दों पर पस्त कांग्रेस की एकमात्र उम्मीद राफेल लड़ाकू विमान सौदा ही बचा है.

मोदी सरकार की आक्रामक राजनीति से पस्त कांग्रेस अब किसी प्रकार से राफेल सौदे को 'बोफोर्स' जैसा घोटाला साबित करने में जुट गई है. कांग्रेस द्वारा इस संबंध में रोज नए-नए तथ्य उजागर किए जा रहे हैं जिससे यह साबित हो सके कि यह वर्तमान सरकार द्वारा किया गया घोटाला है. परन्तु कांग्रेस यह भूल रही है कि बोफोर्स घोटाले और राफेल सौदे में जमीन-आसमान का अंतर है. बोफोर्स तोप का सौदा बिचौलियों के माध्यम से किया गया था और उसमें सौदा कराने के एवज में बिचौलियों को भारी धनराशि दी गई थी. और तो और बिचौलियों का सीधा संबंध गाँधी परिवार से था.  स्वीडन की रेडियो ने सबसे पहले 1987 में इसका खुलासा किया। इसके बाद राजीव गाँधी सरकार के ही एक मंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह ने इस घोटाले को मुद्दा बनाते हुए न केवल राजीव गाँधी सरकार को असहज किया बल्कि 1989 के आम चुनाव में कांग्रेस को सत्ता से भी बाहर होना पड़ा था.

गौरतलब है कि राफेल सौदे में न तो कोई बिचौलिया है और न ही किसी तीसरी एजेंसी ने इस सौदे में किसी प्रकार के भ्रष्टाचार को उजागर किया है. यह दो देशों की सरकार यानि भारत और फ्रांस के बीच का सीधा सौदा है. जहाँ तक अनिल अंबानी की कंपनी को राफेल के निर्माण का अधिकार देने की बात है तो यह दो कंपनियों के बीच का मामला है. फ्रांस की कंपनी भारत में किसे अपना सहयोगी बनाएगी यह उस कंपनी पर निर्भर करता है. इस मामले में अगर भारत सरकार हस्तक्षेप करती तो यह अन्तर्राष्ट्रीय नीति निर्धारण और पेशेवर तौर-तरीकों का सरासर उल्लंघन होता. 

वर्तमान में जो हालात हैं उससे स्पष्ट संकेत मिलता है कि राफेल मुद्दे पर कांग्रेस हवा में तीर चला रही है. इस सौदे में सुराख़ और भ्रष्टाचार के अभी तक कोई मजबूत सबूत और न ही कोई संकेत मिले हैं. ऐसे में स्वाभाविक है कि देश के अन्य विपक्षी दल इस मुद्दे से अभी दूरी बनाए हुए हैं. परन्तु कांग्रेस राफेल सौदे में अनियमितता या उनके आरोप के आधार पर यूँ कहें कि भ्रष्टाचार को इतनी हवा दे चुकी है कि चुनावी मौसम में उससे पीछे हटना अब उसके लिए नामुमकिन साबित हो रहा है. अगर आने वाले एक-दो महीने में राफेल सौदे में भ्रष्टाचार के कोई ठोस सबूत कांग्रेस देश के सामने पेश नहीं कर पाती है तो तय है कि सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी चुनावी अभियान में इसे एक बड़ा मुद्दा बनाएगी और कांग्रेस को बैकफुट पर जाना पड़ेगा. फिर ऐसी स्थिति में अन्य दल भी राफेल पर कांग्रेस का साथ देने से बचेंगे. परिणामस्वरूप कांग्रेस अकेले ही राफेल पर चुनावी सवारी करने के लिए मजबूर होगी.